“नववर्ष” (संस्मरण)

नव वर्ष ”
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( ज०न०वि०-२जपला पलामू झारखंड  )*संस्मरण *
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आज भी मेरा ख्याल है किअगर आप ज०न०वि०-२जपला पलामू आप जायें तो और वहाँ पुछे तो कि नया साल  कैसे  मनाया जाता है तो जरूर कुछ बच्चे दो  चार कहानी सुना ही देगे।नव वर्ष के बारे में अलग अलग ढंग से आनन्द के लहजे में क्यों कि वहाँ पर हर नव वर्ष केपहली जनवरी को बनभोज का आयोजन होता है।जो अपने स्थान को छोड़ कर दूसरे स्थान की तरफ रवाना होते हहै और मौज मस्ती के साथ प्रकृति के गोद में किलकारीयँ छोड़ते हैं।
सन् २०११-१२मे मैं ज०न०वि०जपला पलामू-२मे टी०जी०टी०हिन्दी के पद पर कार्यरत रहा।उस समय एक जनवरी २०१२ को नव वर्ष मनाने की तैयारी बहुत धुम धाम से चल रही थी तैयारी करते करते कब एक जनवरी आ गया पता ही नहीं चला,जिसके लिए इतनी तैयारी चल रही थी बस वही हुआ जो पहले से प्लान चल रहा था।
वन भोज के लिये सूबह में तैयारी शुरू हो गई जिसमें विद्यालय के सभी कर्मचारी अपने- अपने कार्य में लग गये जैसे कोई घर का उत्सव हो और उसको लगन से करने लगे जब कि दो बस एक स्कूल की बुलेरो अपने समय का ध्यान रखते हुए सुबह-सुबह में हाजीर है। प्लान यही बनाया गया था कि विद्यालय से लगभग १५ किलोमीटर दूर लंगरकोट पहाड़ी (कामेश्वर धाम) पर जाने की तैयारी हो गई।वहीं पर सब कुछ खाने-पिने से लेकर गाना बजाना के समान तक बस पर रख दिया गया खाने पर विशेष ध्यान रखा गया मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों का प्रबन्ध रखा गया।जिसमें शाकाहारी में पनीर की व्यवस्था थी सभी कर्मचारी मिलकर १३५थे।
सभी विद्यालय परिवार अपने खानपान साजबाज के साथ कामेश्वर धाम की तरफ दो बस एवं एक बुलेरो रवाना हुई।खुशी के मारे सभी बच्चे झुम रहे थे मानो वैसे जैसे नया जीवन रूपी नया साल करीब आरहा है।वो बच्चों की गाड़ी,किलकारी ,सरारत आपस में तकरार सब के सब में एक नया उमंग दिखाई दे रहा था।जस जस धाम के तरफ गाड़ी आगे बढ रही थी तस तस बच्चों के उमंग को देखकर मौसम भी काफ़ी खुशमिजाज हो गया जो हल्की हल्की बारिश तथा फुहार लिये हुए था मानो जैसे सावन की झड़ी आ गई।इन बच्चों की खुशीया देखकर बादल भी अपने आप को नहीं रोक पाया,वो भी अपना खुशी भरा आशु छलकाने लगा इस बारिश के बुन्द रूपी आशु लोगों के खुशी रूपी आँसुओं से मिल कर २०१२के प्रवेश को अतिसुन्दर बनाया।
तबतक गाड़ी धाम पर पहुँच चुकी थी लोग सामान उतार रहें थे अपनी अपनी जिम्मेदारी सम्भालते हुए सब अपने कार्य में जुट गये कुछ बच्चे जो शेष थे वे इधर उधर पहाड़ी पर मोती की तरह बिखर गये और सावन रूपी फुहार का आनंद उठाने लगे कभी रिमझिम पानी बरसना कभी खुल जाना इसतरह बारिश से भिगे मानो वैसे प्रतित हो रहे थे जैसे यह नया साल आते ही बच्चों के साथ होली मना रहा हो।
तभी इधर बनभोज बनने लगा और उधर बच्चे अन्य कर्मचारी कामेश्वर धाम मन्दिर पर पहुँच कर अपना कार्यक्रम शुरू कर रहे थे याद आ रहा है एक तरफ पनीर,दूसरी तरफ मिट तथा तीसरी तरफ चावल तिनो नये साल के उमंग में फदक रहे थे।ये भी अपने तरीके से नया साल मना रहे थे,साथ ही पहाड़ पर रहने वाले जीव जंतुओं को भी यह पता लग गया था कि आज नया साल है,वे भी अपने बनभोज में अपने स्थान को छोड़कर कहीं निरीह जगह पर चले गये हों ।पहाड़ी के उपर बड़े बड़े शिलाखंड लोगों की खुशियों में लिप्त हो गए थे आसपास का वातावरण भी (बारिश की वजह से) अपने तरीके से मौन धारण कर इस नये साल का स्वागत किया।और पेड़ पौधे का हिलना डोलना ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे हम सभी लोगो के संगीत कार्यक्रम मे शामिल होने  को कह रहे हैं।शामिल नहीं करने पर वह अपनी मन्द मन्द मुस्कान नहीं छोड़ते और जहां है वही से  नव वर्ष का आनंद ले रहे थे।
याद आता है कि जब सभी बच्चे रिमझिम बारिश में अपना कार्यक्रम कर रहे थे तो फिर बारी आई शिक्षकेत्तर कर्मचारी की ये सब भी अपना -अपना एक-एक कार्यक्रम देगें,सभी लोग दो-चार  शब्द बोल कर नव वर्ष पर बच्चों को संबोधित किये जिसमें सबसे मजेदार की बात यह है कि जब मेरी बारी आइ तो  एक शायरी बोला था –
ऐ मेरे दिल की तमन्ना,
मुझे कहाँ तक ले जाओगी।
मेरी तो मंजिल ही मौत है,
क्या उससे भी आगे ले जाओगी।।
दुसरी मजेदार बात यह थी कि उस समय बच्चों के खुशियों को देखकर प्राचार्य स्वयं(एस० सी०झा)बोल पड़े कि हमारे और हिन्दी सर के  बीच हँसीं  प्रतियोगिता होगी मैं पड़ा चक्कर में कि आखिर कैसी प्रतियोगिता है,फिर क्या बस यू ही शुरू हो गया हम दो  लोगो कि प्रतियोगिता। आपस में हम दो लोग हँसने लगे जोर जोर से हसने लगे ।लेकिन हमारे प्राचार्य महोदय अन्ततः जित गये क्योंकि उनके जैसा नहीं हस पाये।बहुत आनंद आया।सभी बच्चे साथ में इसी तरीके से कार्यक्रम किये।फिर साथ में मिलकर एक साथ भोजन करने के उपरांत फिर एक बार कार्यक्रम शुरू हुआ प्रकृति के गोद में इस कार्यक्रम के आनन्द को देखकर यह पता चलता था किसी भी परिस्थिति में अपने मुस्कान खुशियाँ को नहीं छोड़ना चाहिए यहाँ तक कि पर्वत के उपर शिलाखंडों जगह -जगह सफेद मानो वैसा प्रतीत  हो रहा था जैसे हम सभी लोगो के कार्यक्रम को देखकर चहल पहल को। देखकर हँस रहा हो।अर्थात वे सफेद -सफेद टुकड़े पर्वत के दाँत की तरह शोभायमान थे।इस प्रकार नव वर्ष २०१२ ढेर सारी खुशियाँ लेकर आया।
यह उमंग यह खुशी,यह मिल जुल कर हसना ,गाना,उछलना,कुदना,एक दूसरे के साथ चलकर एवं खड़ा हो कर फोटो खिचवाना,एक साथ नाश्ता भोजन करना मानो यह संदेश दे रहे है कि इस नये साल के लिये जो पिछले साल में गिला शिकवा हो उसे भूल कर आपस में परोपकार, सद्भाव ,सत्कर्म एकता से रहने के लिये कह रहा हो।

@रमेश कुमार सिंह ♌

नवोदय का सफर (संस्मरण)

कोई लेखक नहीं हूँ, हाँ थोड़ा बहुत शब्दों में शब्दों को एक कतार में रखकर कुछ पंक्तियों का विस्तार कर देता हूँ। मिल गया है मुझे अपने जिन्दगी में बिताये हुए कुछ पल का भाग जिसको सफर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मान बैठा हूँ और उसी हिस्से को शब्दों के जरिए इन पन्नों में समेटने की कोशिश किया हूँ बस यही है हमारी लेखनी जिसका नामकरण कर दिया हूँ- नवोदय का सफर।
अपने घर पर मकान के छत के उपर प्रतिदिन की तरह लालटेन के प्रकाश में अपनी किताब के पन्ने उकेरकर पढ रहे थे।  २४ जून वर्ष २०११ का दिन मुझे बहुत अच्छी तरह याद है मैं नवोदय विद्यालय के साक्षात्कार से गुजर चुके थे।मुझे परिणाम का इन्तजार था। अपने विषय के किसी सवाल पर मेरी मानसिक क्रियाएँ शक्तियां लगाईं हुई थी,और उस सवाल को अपने अन्तिम चरण तक पहुंचाने की प्रयासरत थी।
तभी अचानक बगल में रखी हुई मोबाइल की घन्टी की आवाज़ आईं। और बिच में ही पढाई से मोह भंग हो जाता है और मैं मोबाइल को हाथ से उठाकर देखा तो नम्बर जाना -पहचाना नहीं था समय ९:४५ सायंकाल हो रहा था। ज्यों ही मोबाइल नंबर को स्वीकार किया तभी उधर आवाज़ आती है कि -आप रमेश कुमार सिंह जी बोल रहे हैं।  तो मैं बोला -हाँ जी, आप कौन ? तभी उधर से आवाज़ आती है-मैं जवाहर नवोदय विद्यालय जपला -२ पलामु से प्राचार्य बोल रहा हूँ आपका चयन हमारे विद्यालय में टी०जी०टी० हिन्दी शिक्षक के पद पर किया गया है आप विद्यालय में आकर योगदान कर अविलम्ब अपना कार्य शुरू करें।
उतना सुनने के बाद ही मेरे खुशियों का ठिकाना न रहा, और २८ जून को पता लगाने के लिए कर्मनाशा स्टेशन से ,बरकाकाना पैसेन्जर पकड़ कर जपला की तरफ चल देते हैं। ट्रेन में बैठे हुए रहे थे कि -कैसा विद्यालय होगा कहाँ होगा।क्या सच्चाई है। यही सब मन में उधेड़बुन चल रहा था। तब तक गाड़ी ,डेहरी स्टेशन पहुँच चुकी थी।वहाँ ज्यों ही गाड़ी गया रेल-पथ को छोड़ती है। तब मुझे ऐसा लगा कि मैं किसी विरान जगहों पर जा रहा हूँ।जंगली इलाका का आभास हो रहा था ।खिड़की के रास्ते मेरी नज़र बाहर के दृश्यों पर जा पहुंचती है। जो चीजें देखतें हैं शायद वही सब कुछ किताबों में पढ़े हुए थे। पलामु जिला का वही छायावृष्टी भाग वाला इलाका जहां  कि भूमि पानी के लिए बराबर तरसती  रहती है।पानी के बिना अपना उपजाऊ पन शक्ति को छोड़ चुकी है विरान हो चुकी है उसे बंजरभूमि की संज्ञा दे दी गयी है।
आस-पास ट्रेन में ही बैठे लोगों से में पुछा तो जानकारी मिली कि- इधर के ही लोग कहीं भी किसी के यहाँ कम मजदूरी पर कार्य करने को तैयार हो जाते हैं।क्यों कि इधर आज भी भुखमरी  है। गाड़ी आगे की तरफ अपनी रफ्तार से चल रही थी।  मैं यही सब देखते जानकारी लेते जा रहा था। तभी बिच में एक छोटा सा पहाड़ दिखाई दिया। उस पहाड़ के अन्दर एक सुरंग थी जिसमें गाड़ी अन्दर से होकर गुजरती हुई पार की तभी मेरी धड़कन और तेज हो गई कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। लेकिन क्या? मेरा पहला जाब था छोड़ भी नहीं सकता था अच्छा पद,अच्छा नौकरी,अच्छा विद्यालय इसलिए नौकरी को पकड़ना मेरी मजबूरी थी। डर मुझे लग रहा था लेकिन डर को अपने अन्दर दबायें हुए था ।
पहाड़ियों को,बंजरभूमि को पार करते हुए गाड़ी अपने लक्ष्य की तरफ़ क्षण-प्रति-क्षण अग्रसर बढ रही थीं। तभी किसी यात्री के मुखारबिन्दु से आवाज़ आईं कि जपला स्टेशन आने वाला है। तभी मैं प्राकृतिक दृश्यों से समझौता कर अपनी दृष्टि को समेटना प्रारम्भ कर दिये। समेटने में कुछ समस्याओं से जुझना पड़ा लेकिन समेट लिया। तभी गाड़ी स्टेशन पर रूक जाती है और मैं प्लेट फार्म पर उतर जाता हूँ मैं वहाँ के लिए अजनबी था । आदमी से लेकर इलाका तक सब अलग तरीके के दीख रहे थे।
फिर मैं प्राचार्य महोदय के यहाँ कॅाल किया और उनके बताये हुए रास्ते के अनुसार चलना प्रारम्भ कर दिया। एक आटो रिक्शा वाले को पकड़ा और बोला कि मुझे नवोदय विद्यालय ले चलोगे। तभी वो जबाब दिया क्यों नहीं मेरा यही तो काम है । कितनी दूर है-मैं बोला। लगभग तीन किलोमीटर है।
मैं विद्यालय पहुँच गया वहाँ देखा एक झारखंड सरकार के कल्याण विभाग का छात्रावास में नवोदय विद्यालय स्पेशल चल रहा था । पहुँचते ही एक गार्ड  एवं चपरासी से मुलाकात हुई वे लोग मुझे थोड़ी देर बैठने के लिए कहा।मैं बैठ गया कभी विद्यालय के बारे में तो कभी उन नये लोगों के बारे में इसी उधेड़बुन में था तभी चपरासी आया और बोला कि अन्दर साहब बुला रहे हैं। मैं अन्दर गया साहब के साथ बातचीत हुई परिचय हुआ। पढने-पढाने के सम्बन्ध में  बातें हुई।आवास से भी सम्बन्धित बातें हुई। और उसी दिन विद्यालय में योगदान भी कर लिये। योगदान करने के उपरांत मैं प्राचार्य महोदय से अनुरोध किया कि मुझे अपने रहने खाने एवं कुछ सामान वगैरह लाने के लिए मुझे दो-तीन दिन की मोहलत दी जाए।ताकि मैं अपने व्यवस्था के साथ रह सकूँ।
मुझे छुट्टी मिल जाती है मैं वापस घर आ जाता हूँ एक तरफ खुश था दूसरी तरफ़ अन्जान जगह होने के नाते खराब भी लग रहा था। लेकिन जो होने वाला है वो होकर ही रहता है।फिर मैं वापस एक जुलाई २०११ को वापस विद्यालय में दैनिक उपयोग करने वाला सामान लेकर पहुँच गया। और उसी दिन विद्यालय के बच्चे अपने घर से छुट्टी बिताकर अपनी पढ़ाई पुनः करने के लिए लगभग ७०% सायंकाल तक आ जाते हैं । हम भी, बच्चों के लिए अन्जान थे बच्चे हमारे लिए भी अंजान थे।
दूसरे दिन हमारे सभी साथी विद्यालय में उपस्थित हो जाते हैं। सभी शिक्षकों को प्राचार्य महोदय के माध्यम से गोष्ठी बुलाईं गई।उस गोष्ठी में प्राचार्य महोदय के माध्यम से शैक्षिक गतिविधियां, आवासीय एवं अन्य कार्य क्षेत्रों से अवगत कराया गया। और सभी लोगो को अपनी-अपनी जिम्मेदारियां सौप दी गई। हमारे सभी शिक्षक साथियों को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई थी जिसमें हमें फर्निचर प्रभारी के साथ-साथ शिवालिक हाउस का हाउस मास्टर की जिम्मेदारी दी गई थी। और समय-सारणी तैयार कर पढाई-लिखाई का सिलसिला शुरु हो जाता है।सब लोग आपस में एक परिवार की तरह रहने लगे और आनंद के साथ एक-एक पल , एक-एक दिन बीतने लगा। बिच-बिच में थोड़ी समस्या आईं लेकिन जैसे ही आईं वैसे ही उसके साथ निदान भी होता गया।
सब-कुछ ठिक चल रहा था लेकिन कमी थी एक २४ घण्टे की जिम्मेदारी थी उस विद्यालय में इसी कमी के वजह से कभी -कभी मन कुन्ठित हो जाता था अच्छा नहीं लगता था लेकिन करें तो क्या करें- मन, कार्यक्षेत्र ,नौकरी,अपनी समस्या का सामंजस्य स्थापित कर चलना ही पड़ता था।इसी बीच हमें कई नवोदय विद्यालय पर जाने का मौका मिला और वहाँ से कुछ कार्यकरने का अनुभव प्राप्त हुआ ।इतना ही नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी के साथ-साथ अपने कर्तव्य के प्रति कर्मठ रहने की सीख मिली।
वास्तव में ऐसे जगहों पर रहने से अच्छा व्यवहार अच्छी सीख एक दूसरे के प्रति अच्छा सहयोग सीखने को मिलता है। आज वो सब कुछ याद है जो वहाँ हम लोग साथ रहे,साथ में विचरण किये, साथ में मंथन किये ,आज सभी बातें हृदय के रास्ते से होकर मानसिक पटल पर होते हुए इस पन्नों में आकर सिमट गई।
———–रमेश कुमार सिंह

धरती में कंपन (कविता)

सहसा,
अचानक बढ़ीं धड़कन,
हृदय में नहीं,
धरती के गर्भ में।
मची हलचल,
मस्तिष्क में नहीं,
भु- पर्पटी में।
सो गये सब,
मनुष्य सहित,
बड़े-बड़े मकान।
सो गये सब
पशुओं सहित,
बड़े-बड़े वृक्ष।
मचा कोहराम,
जन- जीवन में।
हुआ अस्त-व्यस्त
लोगों का जीवन।
फट गया कहीं-कहीं,
धरती का कपड़ा।
टूट गया हर -कहीं,
कोई धागा नहीं,
ढेर सारे मकान।
उजड़ गया सब,
चिड़िया का घोसला सहित,
मानव का आवास।
यहाँ आया था,
कोई जादूगर नहीं,
प्रलय विनाशकारी।
मचा गया प्रलय का ताण्डव,
यह क्षणभर का विपदा,
दे गया आँखों में आँसू।
बहुत से लोग चले गये,
कहीं मौज मस्ती करने नहीं,
अपनी अन्तिम यात्रा पर।
दे गये पिड़ा सिर्फ़,
अपनों को ही नहीं,
पुरे मानवता को—-
यहीं हुआ धरती में कंपन।
——–@रमेश कुमार सिंह
———–२६-०४-२०१५

राहगीर (कविता)

चला जा रहा चला जा रहा,
कहाँ जा रहा कहाँ जा रहा,
पता नहीं मुझे पता नहीं,
कहाँ जा रहा पता नहीं।

अपने दिल के अन्दर,
लिए सुख दुख का समंदर,
लिये दुखो का भण्डार,
या फिर लिए सपने सुन्दर,
पता नहीं मुझे पता नहीं,
कहाँ जा रहा पता नहीं।

अपनी मंजिल साथ लिए वह
अपने दिल में आस लिये वह
शायद करने कोई महान कार्य
दिल दिये जलाये हुए वह
पता नहीं मुझे पता नहीं,
कहाँ जा रहा पता नहीं।

भाई मेरे इधर तो आओ
कहाँ जा रहा मुझे बताओ
तब वह मुझसे आकर बोला
दुनिया में है अनेक दिल वाले
दर्द है अब तक जिनके दिल में
खुद हँसो और सबको हँसाओ

बात यही मै बताने जा रहा
चला जा रहा चला जा रहा।

~~~~~~~रमेश कुमार सिंह ♌