मुक्तक -१

आज का दिवस हमारे देश का~~~ सौभाग्य है।
गगन में लहरा रहा तिरंगा~~~~~अहोभाग्य है।
देश आज के दिन यहाँ~~~तीन रंगों में रंग गया,
करता हूँ नमन तिरंगे को,यह हमारा सौभाग्य है।।
______________रमेश कुमार सिंह/२५-०१-२०१६
पर्यावरण का सुरक्षा  करना हमारा धर्म है
वृक्ष और पौधा लगाना यही हमारा कर्म है
इससे वायुमंडल का संतुलन हो जाता है
पृथ्वी को हरा भरा करना यही सत्कर्म है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दुनिया वालों से हमारा एक यही पुकार है।
बच्चों की भान्ति वृक्षों का करना सत्कार है।
वृक्षों से धरा को सजाने और सँवारने के लिए,
वृक्षारोपण कर सभी का करना उपकार है।।
@रमेश कुमार सिंह

कल-कल की ध्वनि साथ लिए।
हवाओं का झोका साथ लिए।
वर्षा रानी नभ से आईं
हर पल की ठन्डी साथ लिए।।
____________रमेश कुमार सिंह/०९-०१-२०१६
मुड़कर देखने वालों की कोई चाहत नहीं होती।
सिर्फ सुरत निहारते हैं, कोई आहट नहीं होती।
मसोसकर रह जाते हैं किसी सौन्दर्य को देखकर,
चली जाती है वो लोगो को कोई राहत नहीं होती।।
______________रमेश कुमार सिंह /११-०१-२०१६

दौलत को पाने के लिए हर परिस्थिति में साथ दिया।
जब पा गया दौलत तो हर परिस्थिति में जबाब दिया।
यही दुनिया की रीत,यहाँ प्रीति को भूल जाते हैं लोग,
निभायेंगे नहीं साथ तुम्हारा अपनों ने आवाज़ दिया।।
___________________रमेश कुमार सिंह /२०-०१-२०१६
क्यूँ लोग ऐसे याद आते हैं।
आने के बाद चले जाते हैं ।
ढुढती रह जाती है निगाहें,
क्यूँ ऐसे लोग को हम पाते हैं।
________रमेश कुमार सिंह

क्या बचपन का शौक है
यह एक अच्छा मौज है
आज पहुँच गये हम वहाँ पर ,
जहां हमेशा के लिए रौब है।।

स्वतंत्रता सेनानी नेता जी  के याद में मेरी चार पंक्तियां आप लोग के समक्ष प्रस्तुत ————-
•••••••••••••••••••••••••••••
हो गया यह देश, लुटेरों का डेरा ।
धुम रहे चतुर्दिश, बनकर सफेरा।
बोस जी की कमी खल रही यहाँ ,
आ जाओ अब सत सत नमन मेरा।
@रमेश कुमार सिंह /२२-०१-२०१६

आपकी स्वीकृति मिल गई। मेरे अन्दर खुशी खिल गई। ऐसे ही साथ देते रहे। हमेशा,/ क्यों कि मेरी अच्छी जग। मिल गई।

कितना बदल गया आज का जमाना।
एक रीति नई है यहाँ दूसरा है पुराना।
भारतीय संस्कृति में कहाँ से आ गई,
क्या है ? मॅाम और माता का तराना।।
________________रमेश कुमार सिंह

••••••••••••••••
श्वेत रंग में उज्जवल मन का विश्वास लिए ।
शितलता की छांव में सुन्दर स्वभाव लिए।
पानी के उपरी परत पर— फिसलते हुए,
प्रकृति के गोद में शांति का भाव लिए।।१।।
•••••
मौन में ही ईश्वर से आराधना कर रहा है।
हँस अपने बारे में– ईश्वर से कह रहा है।
तालाब के बीच, पानी में, आसन लगाये,
तन- मन से लीन होकर मंत्र पढ रहा है।।२।।
_____________रमेश कुमार सिंह /२९-०१-१६
उजड़े चमन में चहकने की खुशियां छाईं है।
हरियाली की जगह पक्षियों ने धूम मचाई है।
रंग – विरंगों में खिला यह वृक्ष— विरानो में,
लगता है विशेष चर्चा में, दूर देश से आईं है।
_________रमेश कुमार सिंह /३०-०१-२०१६
अपने विचारों को प्रवाहमय करें।
हर माहौल को, साहित्यमय करें।
शब्दों का आदान-प्रदान कर यहाँ
साहित्यिक मंच का उदय करें ॥
_____________रमेश कुमार सिंह
मनभावन लिए, मधुमास में ।
प्रेम प्रस्फुटित कर, आस में ।
परस्पर अपनों से बन्दगी कर,
प्रेम दिवस मनाने के प्रयास में।
___________रमेश कुमार सिंह
___________09-02-2016

प्यार से ही प्यार को ऐसे सुला दिया।

जिन्दगी को इस राह से ऐसे छुड़ा दिया।

ले नहीं सका उसके बाहों की छांव को,

मुहब्बत के सफर में ऐसे भूला दिया।
_______________रमेश कुमार सिंह
_______________11-02-2016

आप जल्दी ठीक हो जायें  ईश्वर से करबद्ध प्रार्थना है।
आप स्वास्थ्य  को प्राप्त करें ईश्वर से मेरी अर्चना है।
आपकी आवाज़ तथा परिवार में खुशियां लौट आवें,
आपका शरीर स्वस्थ से भरा पुरा हो यही मेरी वन्दना है।
___________________________रमेश कुमार सिंह
प्रेम रंग ऐसा चढा कि, हम प्रेमी बन गये।
प्रेम रंग में रगा गया मन, हम योगी बन गये।
त्याग कर चले गये, माया रुपी संसार को,
स्नेह का रसपान कर प्रेमवस्त्र भोगी बन गये।
________रमेश कुमार सिंह /१७-०२-२०१६

पद चिह्न छोड़ते हुए रेत के सिवानों में।
राहगीर बन गया अंधेर की दिशाओं में।
जिन्दगी के सफर में कैसा अकेलापन,
सब छोड़कर चल दिया क्यों वीरानों में॥
________________रमेश कुमार सिंह
शान्तिः नहीं है , यहाँ है अशान्ति ।
हम चैन से नहीं है,यहाँ है भ्रान्ति ।
अमन भरा माहौल बनाने के वास्ते,
हम सबको करना है सर्वत्र क्रांति।
_______________रमेश कुमार सिंह
__________________०२-०२-२०१६

वाह बनाया हुआ यह कार ।
इन्सानो ने दिया क्या आकार।
रोड पर जब दौडती है सरपट,
मचाती चलती है हाहाकार।
___________रमेश कुमार सिंह

मुद्रा का चक्कर।
बड़ा घनचक्कर।
दौड़ते फिरते हैं,
लगाते हैं चक्कर।
___रमेश कुमार सिंह
कहीं धुप है– कहीं छाव है।
कहीं सुध है कहीं सुझाव है।
आपस में, सलाह करतें रहे,
कहीं आप हैं कहीं पड़ाव है॥
_________रमेश कुमार सिंह

दिल में गूंजता किसी का विचार था।
जिन्दगी में वो ढुढता एक प्यार था।
काँटों भरा उसका—- इजहार था।
बेबसी भरा उसका—इन्तजार था।
___________रमेश कुमार सिंह
क्या उम्दा पंक्ति बनाईं आपने।
सबको दिशा– दिखाई आपने।
आपस में सलाह मसविरा कर,
लेखनी में खूब रंग लाई आपने।
___________रमेश कुमार सिंह
जन्मदिन पर मित्रों से बहुत मिला मुझे प्रेममय सम्मान।
आशीर्वचन,शुभकामनाओं और स्नेह से हुए धन-धान्य।
शुभ दिवस के दिन स्नेह पाकर मन प्रफुल्लित हो गया।
हृदयतल से कह रहा हूँ आप सभी को सादर धन्यवाद।
_________________रमेश कुमार सिंह /०५-०२-२०१५ ।
दिन ढल जाता है साम हो जाती है ।
अंधेरा छा जाता है रात हो जाती है।
खिल जाता है  फूल मुस्कुराते हुए,
हवाओं के साथ खुशबू फैल जाती है।
_______रमेश कुमार सिंह /०५-०२-२०१५
जहर भी पीना होता तो पी कर दिखा देता,
अगर वो मल्लिका मुझसे दूर नहीं होती।
जहर को अमृत समझकर एक घुट ले लेता,
अगर वह आने एक आवाज़ सुनाई होती।
_____________________रमेश कुमार सिंह

सीखने चला था वो इस बेरहम संसार में।
सीख नहीं पाया लौट आया इस जहान में।
क्या करें दुनिया का दस्तूर देख करके वो,
हाथ पे हाथ रखकर चला गया समशान में॥
____________________रमेश कुमार सिंह

नियोजित नियम से, नहीं हुए बहाल।
इसलिए इनका है– आज बुरा हाल।
सरकार ने तो वोट की रोटी सेक ली,
नियोजित शिक्षक का करके बहाल॥
_______________रमेश कुमार सिंह

कातील निगाहों से मेरे, दिल को घायल कर डाला।
उसको पाने कि खातीर मैं,बन गया यहाँ मतवाला ।
उसकेआने की आहटों से, घुम रहा हूँ यहाँ वहाँ।
मुझको करके मद मस्त यहाँ ,पिलाई जाम का प्याला।

++++++++++++++++++++++++++++++++
तब-तक जिन्दगी यूँ ही इस दुनिया में भटकती रह जायेगी।
जब-तक अधिकारी अपने अधिकार को समझ नहीं पायेगे।
किसी की बेबसी, लाचारी ,मजबूरिया पटकती रह जायेगी।
जब-तक हर कर्मी अपने अन्दर ईन्सानियत रख नहीं पायेंगे।

++++++++++++++++++++++++++++++++

(1)
नव वर्ष में नव-उमंग नव-प्रभात लिए ।
नव-किरण का हर्षमय उल्लास लिए ।
नई-योजना नये संकल्प का भाव लेकर,
नूतन-पथ-प्रण-रस-का आगाज लिए।।
@रमेश कुमार सिंह /२८-१२-२०१५

(2)
नव वर्ष में आप हर्षोल्लास मय हों।
धन-धान्य से परिपूर्ण जीवन सुखमय हो।
असीम खुशियां मिलें आपके जीवन में,
नयी उमंग सह् नव वर्ष मंगलमय हो।।
@रमेश कुमार सिंह /१६-१२-२०१५
नया साल आ रहा है इस बात को याद करें।
बित रहा जो साल,उसका भी ख्याल करें।
गतवर्ष की विदाई,नववर्ष का स्वागत करके,
इस नूतन वर्ष में नया संकल्प का ध्यान करें।
@रमेश कुमार सिंह /२८-१२-२०१५

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
नया वर्ष आ रहा है लोगों में उमंग देखना।
सूर्य की किरणों में अलग तरंग देखना।
खुशियों से परिपूर्ण नववर्ष का प्रथम दिन,
सुनसान जगहों पर एक नया प्रसंग देखना।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
@रमेश कुमार सिंह /२९-१२-२०१५

दस्तक दे रहा है नया साल का पहला कदम।
नई उमंग,नई सोच,नई प्रेरणा,दे रहा हरपल।
एकता माधुर्य का एक नया शुभ संदेश लेकर,
बढ रहा है हर क्षण,हरपल सब जगह हरदम।।
@रमेश कुमार सिंह /०२-०१-२०१६
क्या पता ये क्यों इन्सान के रुप में पत्थर बन जन्म लिया है।
पत्थर की भी मूर्तियां किसी की बेबसी पर पिघल जाती है।
इन मूर्तियों में तो ईश्वर ने  शरीर के साथ-साथ जीव दिया है
यही वजह,इनके सामने से किसी की बेबसी निकल जाती है।
___________________________________रमेश कुमार सिंह

आज का दिवस हमारे देश का~~~ सौभाग्य है।
गगन में लहरा रहा तिरंगा~~~~~अहोभाग्य है।
देश आज के दिन यहाँ~~~तीन रंगों में रंग गया,
करता हूँ नमन तिरंगे को,यह हमारा सौभाग्य है।।
______________रमेश कुमार सिंह/२५-०१-२०१६
पर्यावरण का सुरक्षा  करना हमारा धर्म है
वृक्ष और पौधा लगाना यही हमारा कर्म है
इससे वायुमंडल का संतुलन हो जाता है
पृथ्वी को हरा भरा करना यही सत्कर्म है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दुनिया वालों से हमारा एक यही पुकार है।
बच्चों की भान्ति वृक्षों का करना सत्कार है।
वृक्षों से धरा को सजाने और सँवारने के लिए,
वृक्षारोपण कर सभी का करना उपकार है।।
@रमेश कुमार सिंह

कल-कल की ध्वनि साथ लिए।
हवाओं का झोका साथ लिए।
वर्षा रानी नभ से आईं
हर पल की ठन्डी साथ लिए।।
____________रमेश कुमार सिंह/०९-०१-२०१६
मुड़कर देखने वालों की कोई चाहत नहीं होती।
सिर्फ सुरत निहारते हैं, कोई आहट नहीं होती।
मसोसकर रह जाते हैं किसी सौन्दर्य को देखकर,
चली जाती है वो लोगो को कोई राहत नहीं होती।।
______________रमेश कुमार सिंह /११-०१-२०१६

दौलत को पाने के लिए हर परिस्थिति में साथ दिया।
जब पा गया दौलत तो हर परिस्थिति में जबाब दिया।
यही दुनिया की रीत,यहाँ प्रीति को भूल जाते हैं लोग,
निभायेंगे नहीं साथ तुम्हारा अपनों ने आवाज़ दिया।।
___________________रमेश कुमार सिंह /२०-०१-२०१६
क्यूँ लोग ऐसे याद आते हैं।
आने के बाद चले जाते हैं ।
ढुढती रह जाती है निगाहें,
क्यूँ ऐसे लोग को हम पाते हैं।
________रमेश कुमार सिंह

क्या बचपन का शौक है
यह एक अच्छा मौज है
आज पहुँच गये हम वहाँ पर ,
जहां हमेशा के लिए रौब है।।

स्वतंत्रता सेनानी नेता जी  के याद में मेरी चार पंक्तियां आप लोग के समक्ष प्रस्तुत ————-
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हो गया यह देश, लुटेरों का डेरा ।
धुम रहे चतुर्दिश, बनकर सफेरा।
बोस जी की कमी खल रही यहाँ ,
आ जाओ अब सत सत नमन मेरा।
@रमेश कुमार सिंह /२२-०१-२०१६

आपकी स्वीकृति मिल गई। मेरे अन्दर खुशी खिल गई। ऐसे ही साथ देते रहे। हमेशा,/ क्यों कि मेरी अच्छी जग। मिल गई।

कितना बदल गया आज का जमाना।
एक रीति नई है यहाँ दूसरा है पुराना।
भारतीय संस्कृति में कहाँ से आ गई,
क्या है ? मॅाम और माता का तराना।।
________________रमेश कुमार सिंह

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श्वेत रंग में उज्जवल मन का विश्वास लिए ।
शितलता की छांव में सुन्दर स्वभाव लिए।
पानी के उपरी परत पर— फिसलते हुए,
प्रकृति के गोद में शांति का भाव लिए।।१।।
•••••
मौन में ही ईश्वर से आराधना कर रहा है।
हँस अपने बारे में– ईश्वर से कह रहा है।
तालाब के बीच, पानी में, आसन लगाये,
तन- मन से लीन होकर मंत्र पढ रहा है।।२।।
_____________रमेश कुमार सिंह /२९-०१-१६
उजड़े चमन में चहकने की खुशियां छाईं है।
हरियाली की जगह पक्षियों ने धूम मचाई है।
रंग – विरंगों में खिला यह वृक्ष— विरानो में,
लगता है विशेष चर्चा में, दूर देश से आईं है।
_________रमेश कुमार सिंह /३०-०१-२०१६
अपने विचारों को प्रवाहमय करें।
हर माहौल को, साहित्यमय करें।
शब्दों का आदान-प्रदान कर यहाँ
साहित्यिक मंच का उदय करें ॥
_____________रमेश कुमार सिंह
मनभावन लिए, मधुमास में ।
प्रेम प्रस्फुटित कर, आस में ।
परस्पर अपनों से बन्दगी कर,
प्रेम दिवस मनाने के प्रयास में।
___________रमेश कुमार सिंह
___________09-02-2016

प्यार से ही प्यार को ऐसे सुला दिया।

जिन्दगी को इस राह से ऐसे छुड़ा दिया।

ले नहीं सका उसके बाहों की छांव को,

मुहब्बत के सफर में ऐसे भूला दिया।
_______________रमेश कुमार सिंह
_______________11-02-2016

आप जल्दी ठीक हो जायें  ईश्वर से करबद्ध प्रार्थना है।
आप स्वास्थ्य  को प्राप्त करें ईश्वर से मेरी अर्चना है।
आपकी आवाज़ तथा परिवार में खुशियां लौट आवें,
आपका शरीर स्वस्थ से भरा पुरा हो यही मेरी वन्दना है।
___________________________रमेश कुमार सिंह
प्रेम रंग ऐसा चढा कि, हम प्रेमी बन गये।
प्रेम रंग में रगा गया मन, हम योगी बन गये।
त्याग कर चले गये, माया रुपी संसार को,
स्नेह का रसपान कर प्रेमवस्त्र भोगी बन गये।
________रमेश कुमार सिंह /१७-०२-२०१६

पद चिह्न छोड़ते हुए रेत के सिवानों में।
राहगीर बन गया अंधेर की दिशाओं में।
जिन्दगी के सफर में कैसा अकेलापन,
सब छोड़कर चल दिया क्यों वीरानों में॥
________________रमेश कुमार सिंह
शान्तिः नहीं है , यहाँ है अशान्ति ।
हम चैन से नहीं है,यहाँ है भ्रान्ति ।
अमन भरा माहौल बनाने के वास्ते,
हम सबको करना है सर्वत्र क्रांति।
_______________रमेश कुमार सिंह
__________________०२-०२-२०१६

वाह बनाया हुआ यह कार ।
इन्सानो ने दिया क्या आकार।
रोड पर जब दौडती है सरपट,
मचाती चलती है हाहाकार।
___________रमेश कुमार सिंह

मुद्रा का चक्कर।
बड़ा घनचक्कर।
दौड़ते फिरते हैं,
लगाते हैं चक्कर।
___रमेश कुमार सिंह
कहीं धुप है– कहीं छाव है।
कहीं सुध है कहीं सुझाव है।
आपस में, सलाह करतें रहे,
कहीं आप हैं कहीं पड़ाव है॥
_________रमेश कुमार सिंह

दिल में गूंजता किसी का विचार था।
जिन्दगी में वो ढुढता एक प्यार था।
काँटों भरा उसका—- इजहार था।
बेबसी भरा उसका—इन्तजार था।
___________रमेश कुमार सिंह
क्या उम्दा पंक्ति बनाईं आपने।
सबको दिशा– दिखाई आपने।
आपस में सलाह मसविरा कर,
लेखनी में खूब रंग लाई आपने।
___________रमेश कुमार सिंह
जन्मदिन पर मित्रों से बहुत मिला मुझे प्रेममय सम्मान।
आशीर्वचन,शुभकामनाओं और स्नेह से हुए धन-धान्य।
शुभ दिवस के दिन स्नेह पाकर मन प्रफुल्लित हो गया।
हृदयतल से कह रहा हूँ आप सभी को सादर धन्यवाद।
_________________रमेश कुमार सिंह /०५-०२-२०१५ ।
दिन ढल जाता है साम हो जाती है ।
अंधेरा छा जाता है रात हो जाती है।
खिल जाता है  फूल मुस्कुराते हुए,
हवाओं के साथ खुशबू फैल जाती है।
_______रमेश कुमार सिंह /०५-०२-२०१५
जहर भी पीना होता तो पी कर दिखा देता,
अगर वो मल्लिका मुझसे दूर नहीं होती।
जहर को अमृत समझकर एक घुट ले लेता,
अगर वह आने एक आवाज़ सुनाई होती।
_____________________रमेश कुमार सिंह

सीखने चला था वो इस बेरहम संसार में।
सीख नहीं पाया लौट आया इस जहान में।
क्या करें दुनिया का दस्तूर देख करके वो,
हाथ पे हाथ रखकर चला गया समशान में॥
____________________रमेश कुमार सिंह

नियोजित नियम से, नहीं हुए बहाल।
इसलिए इनका है– आज बुरा हाल।
सरकार ने तो वोट की रोटी सेक ली,
नियोजित शिक्षक का करके बहाल॥
_______________रमेश कुमार सिंह

कातील निगाहों से मेरे, दिल को घायल कर डाला।
उसको पाने कि खातीर मैं,बन गया यहाँ मतवाला ।
उसकेआने की आहटों से, घुम रहा हूँ यहाँ वहाँ।
मुझको करके मद मस्त यहाँ ,पिलाई जाम का प्याला।

++++++++++++++++++++++++++++++++
तब-तक जिन्दगी यूँ ही इस दुनिया में भटकती रह जायेगी।
जब-तक अधिकारी अपने अधिकार को समझ नहीं पायेगे।
किसी की बेबसी, लाचारी ,मजबूरिया पटकती रह जायेगी।
जब-तक हर कर्मी अपने अन्दर ईन्सानियत रख नहीं पायेंगे।

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(1)
नव वर्ष में नव-उमंग नव-प्रभात लिए ।
नव-किरण का हर्षमय उल्लास लिए ।
नई-योजना नये संकल्प का भाव लेकर,
नूतन-पथ-प्रण-रस-का आगाज लिए।।
@रमेश कुमार सिंह /२८-१२-२०१५

(2)
नव वर्ष में आप हर्षोल्लास मय हों।
धन-धान्य से परिपूर्ण जीवन सुखमय हो।
असीम खुशियां मिलें आपके जीवन में,
नयी उमंग सह् नव वर्ष मंगलमय हो।।
@रमेश कुमार सिंह /१६-१२-२०१५
नया साल आ रहा है इस बात को याद करें।
बित रहा जो साल,उसका भी ख्याल करें।
गतवर्ष की विदाई,नववर्ष का स्वागत करके,
इस नूतन वर्ष में नया संकल्प का ध्यान करें।
@रमेश कुमार सिंह /२८-१२-२०१५

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
नया वर्ष आ रहा है लोगों में उमंग देखना।
सूर्य की किरणों में अलग तरंग देखना।
खुशियों से परिपूर्ण नववर्ष का प्रथम दिन,
सुनसान जगहों पर एक नया प्रसंग देखना।।
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@रमेश कुमार सिंह /२९-१२-२०१५

दस्तक दे रहा है नया साल का पहला कदम।
नई उमंग,नई सोच,नई प्रेरणा,दे रहा हरपल।
एकता माधुर्य का एक नया शुभ संदेश लेकर,
बढ रहा है हर क्षण,हरपल सब जगह हरदम।।
@रमेश कुमार सिंह /०२-०१-२०१६
क्या पता ये क्यों इन्सान के रुप में पत्थर बन जन्म लिया है।
पत्थर की भी मूर्तियां किसी की बेबसी पर पिघल जाती है।
इन मूर्तियों में तो ईश्वर ने  शरीर के साथ-साथ जीव दिया है
यही वजह,इनके सामने से किसी की बेबसी निकल जाती है।
___________________________________रमेश कुमार सिंह

११०चतुष्पदी

हद से ज्यादा खुश हैं—- क्या बात है।
चेहरे पर भरपूर मुस्कान, लाजवाब है।
किस कारण– खिलखिला उठा चेहरा,
मुझे भी जानने की, हृदय से आस है।।
१४-१०-२०१५

•••••••••••••••••••

जिन्दगी के राह में,अनेकों मोड़ मिलते हैं।
सब पर लोग चलकर~ गुजरना चाहतें हैं।
हर समय बिताने के बाद~~ आखिरी में,
एक ही जगह पर जाकर लोग मिलते हैं।।
०६-१०-२०१५

••••••••••••••••••

सब कुछ है यहाँ लेकिन क्यों~~विरान सा लगता है।
चहल-पहल है यहाँ लेकिन क्यों बेताल सा लगता है।
धरातल पर इतनी हरियाली फैलने के बावजूद भी,
पहाड़, बादलों का मिलन क्यों बेजुबान सा लगता है।।

२६-०८-२०१५

•••••••••••••••••••••

हौसला पर ही ~~~~~~मंजिल टीका है।
बुलन्दी से ही~~~~~~~ जीवन टीका है।
बुलन्दी भरा हौसला ~जिसके पास न हो,
उसके जिन्दगी का सफर भी फिका है।।

•••••••••••••••••

मेरे अन्दर हमदर्द को जागृत कर क्यों दूर चली गई।
प्यार को अंकुरित कर- दिल में जगह क्यों बना गई।
मैं यत्र-तत्र भटकता रहता हूँ तुम्हारे बिन, इस जग में,
हमारे महफिल भरी जिन्दगी में एक छवि क्यों दे गई।।
०१-०७-२०१६

••••••••••••••••••

हर लोग आज यहाँ पर परेशान क्यों हैं।
एक दूसरे को आजमाने में हैरान क्यों है।
आपस में टकराकर समाप्त हो रहे है,
दुनिया में बन गया ऐसा इन्सान क्यों हैं ।

•••••••••••••••

हमारे अन्दर हैं—- सुन्दर,
तो सारा जग हैं—- सुन्दर,
सुन्दरता का भण्डार यहाँ,
सबके मन में हैं— सुन्दर।

•••••••••••••••

हृदय की आवाज़— जब निकलने लगती है।
तो शब्दों के रूप में पन्नों पर छपने लगती है।।
किसी की भावना उभरकर सामने आ गई है।
न चाहते हुए भी कविता बन निकल गई है।।

••••••••••••••••

मेरी जिन्दगी का एक-एक लम्हा क्यों बिखरता जा रहा है।
जो सपने सजाये थे वो तिनका-तिनका उड़ता जा रहा है।
इसे मैं कैसे इकट्ठा करूँ बेहतर जीवन के लिए,
इस समस्या ने मेरे उलझन को बढाता जा रहा है।।

••••••••••••••••••

सुखमय यात्रा मैं  करते आज तक आया हूँ।
दुखमय यात्रा को आज से मैं देख रहा हूँ ।
कितनी लम्बी यात्रा होगी कैसे जान पाऊँ,
उधेड़बुन में आज मैं पल पल सोच रहा हूँ।

••••••••••••••••••••••

सुखमय जीवन जा रहा है।
दुखमय जीवन आ रहा है।
महसूस ऐसा क्यों आज,
पल-पल मुझे हो रहा है।।

••••••••••••••••••

देखते-देखते नयनो के जरिए हृदय में—- महल बना लिया।
बात करते-करते आवाज़ों के जरिए मुझे दिवाना बना दिया।
अब तक तेरी अदाओं के रंग में ऐसा रंगीन हो गया हूँ— मैं
हमेशा के लिए मेरे ख्वाबों-ख्यालों मे स्थायी जगह बना लिया।
१२-०५-२०१५

••••••••••••••••••••

रह-रह कर मन में क्यों कसक उठ जाती है।
मेरे दिल पर कोई दर्द क्यों दस्तक दे जाती है।
जितना भी मैं उसे भूलने की कोशिश करता हूँ
उतना ही अधिक उदासी मन में छा जाती हैं।।
०७-०५-२०१५

••••••••••••••••

ये दुनिया सिर्फ मतलब की– -संगी है।
काम निकालने के लिए साथ– देती है।
स्वार्थसिद्धि हो जाता इनका पुरा अगर,
साथ छोड़ कर रफूचक्कर हो जाती है।

••••••••••••••••••

कैसा रहा हमारे फूलों का खुशबू।
कुछ तो बताइए हम भी सुन लूँ।
बहुत मेहनत से हमने उगाया था,
सोचा मित्रों को समर्पित कर दूँ।
०३-०५-२०१५

••••••••••••••••••••

मोहब्बत की उम्मीद पे ही जिन्दगी सँवरती है।
झुकी – झुकी नजरों में मोहब्बत बसीं रहती है।
मोहब्बत में ही सब कुछ बयां हो जाता है यारों
इशारे ही सबकुछ है जो लबों पे नहीं आती हैं।।
२९-०४-२०१५

••••••••••••••••••

जो सो जायेगा——– वो खो जायेगा।
जीवन मे कभी कुछ नहीं- बन पायेगा।
ऐ मेरे प्यारे साथियों सभी से गुजारिश है,
किसी भी स्थिति में कभी नहीं सोयेगा।

•••••••••••••••••••

अगर हमारा संयोग न——- होता,
तो हम फेशबुक पर कहाँ से आते।
अगर हम आईडी बनाया न– होता,
आप लोगों से कैसे होती मुलाकातें।।
२७-०२-२०१५

•••••••••••••••••

हांथो में छलकता जाम का प्याला होता।
आँखों में उल्फत का नजारा होता।
तलवारों की जरुरत नही पड़ती— यहाँ
काश नजरों से कत्लेआम हमारा होता।।
१८-१२-२०१५

••••••••••••••••

सब भरा पुरा है यहाँ लेकिन लगता सुनसान क्यों ?
हर कार्य कठिन यहाँ पर लगता आसान क्यों ?
बच्चे- बुढे-व्यस्क हर उम्र का यहाँ चहल- पहल,
फिर भी यहाँ पर लोग एक दूसरे से परेशान क्यों?
१८-१२-२०१५

•••••••••••••••••••

गजब की एकता देखीं हमने गलत राह पर चलने की।
लोग इकठ्ठा हो जाते हैं नियम को ताख पर रखने की।
इसमें मनुज का दोष नहीं यह परंपरा रही  यहाँ,
नीचे से लेकर उपर तक देते सीख गलत करने की।।
१८-१२-२०१५

•••••••••••••••••••••

तुम दूर सही तो क्या हम तुम्हें ही याद करते हैं।
तुम मिलो या ना मिलो,मिलने की फरियाद करते हैं।
प्यार में मुकद्दर का सिकन्दर कौन बना है आज यहाँ,
मैं कल भी प्यार करता था आज भी प्यार करते हैं।।
२२-१२/२०१५

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प्रकृति के गोद में, नदी किनारे क्या चाल है।
लाल जुता खाकी वर्दी में क्या कदम ताल है।
बनें रहे हमेशा इस देश के जांबाज सिपाही,
ईमानदारी पास रखना देश का बूरा हाल है।।
१८-१२-२०१५

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नदी किनारे खाकी में लड़की खड़ी है।
खाकी में दिखने के लिए खुब लड़ी है।
जो चाहत रखी थी अपने जिन्दगी में वो,
आज उस दहलीज पर वो खुद खड़ी है।।
१८-१२-२०१५

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माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद सदा बने रहे।
भगवान धनवन्तरी की कृपा सदैव बने रहे।
धन धान से परिपूर्ण  स्वथ्य चिरायु हो,
ढेरों शुभकामनाएं आप सब पर बने रहे।
०९-११-२०१५

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निंद आती है सपने आते हैं।
याद आती है ख्वाब सजाते है।
ख्यालों में तैरते हुए लम्हों को,
करवटें बदलते विताये जाते हैं।

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नव किरण बनकर मेरी मित्र परिधि के अन्दर आ जा।
कर दें सबका जीवन स्वर्णमय प्रकाश अन्दर फैला जा।
यहा अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से साहित्य की दुनिया में ,
साहित्यमय  कर सर्वत्र अलौकिक ज्ञान दीप जला जा।
०५-१२-२०१५

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नव किरणों ने स्वर्ण सी आभा लिए सुप्रभात कह रही है।
ठन्ढी हवा शीतलता की छांव लिये सर्वत्र बह रही है।
पंछियों का कलरव बच्चों की किलकारी खुशनुमा पल में,
स्वर्णमय चादर विछाये स्वर्णिम जीवन में उमंग भर रही है।
०२-१२-२०१५

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उठो सबेरा हो गया।
देखो चाँद भी सो गया।
स्वर्णिम आभा को देखकर,
देखो अंधेरा वो गया।
०१-१२-२०१५

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लगता है वर्षों से हुई मुलाकात
सामने से अब कभी होती नहीं बात।
कभी तो आ जायें आमने-सामने,
अब ये जुदाई होती नहीं बरदाश्त।
२२-११-२०१५

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जन्मदिन की की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मुबारकबाद हो।
आपका आनेवाला भविष्य निरन्तर अग्रसर उज्ज्वलमय हो।
हमेशा नेक रास्ते पर चलते हुए जीवन में एक नई उचाई दे,
अच्छे इंसान बनकर हमारे बीच में रोशन करें मेरी यही दुआ हो।
साली के जन्मदिन पर

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इन जुल्फों को न  ऐसे लहराया करो।
इन अदाओं  को न ऐसे दिखाया करो।
इन आँखों के साथ मुस्कान छोड़कर,
मुझे इस कदर न तड़पाया करो।।

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बहुत सुंदर आप अपनी रचनाओं को किये जा रहे हैं।
सभी रचनाकारों को अच्छी सीख दिये जा रहे हैं।
हमारे बीच आपकी प्रतिभा निखरती रहे हमेशा,
हम आभार व्यक्त एवं धन्यवाद देते जा रहे हैं।।

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प्राकृतिक छटा निखर रही है।
बादलों के नीचे डगर रही है।
यह हरा भरा धरती का चादर,
कितना सुन्दर लहर रही है।
२२-१२-२०१५

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इसी तरह हमेशा मुस्कुराते रहो।
लोगों को खुशियाँ सुनाते रहो।
अपने में मित्रवत व्यवहार कर,
हमेशा आगे कदम बढाते रहो।
३०-०७-२०१५

••••••••••••••••

आपकी याद में खोए हुए हैं।
अपने बेड पर सोए हुए हैं।
आपसे बाते करते हुए,
सपनों को संजोए हुए हैं
३०-०७-२०१५

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जय विजय परिवार का अभिनन्दन करता हूँ।
सभी रचनाकारों पाठकों का वन्दन करता हूँ।
आगे बढाने का श्रेय सिंघल जी को जाता है,
मैं हृदय से ऐसे विभूति को नमन करता हूँ।।

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तुम कहाँ हो नहीं मिला कुछ खोज-खबर।
मिलने की कोशिश करती तुम रोज-मगर।
मालूम नहीं कहाँ हो इस दुनिया में मशगूल
गई नही होती तुम दूर,मैं देखता रोज-अगर।।
०३-०१-२०१६

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भूली- भटकी चली गईं तुम छोड़ गईं संसार,
बिना तुम्हारे लगता जीवन जैसे हो निस्सार,
सारे बंधन तोड़ गई हो और गईं मुख मोड़ ,
ह्रदय बसी है याद तुम्हारी आँखों में जल-धार !

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मै कभी देखा न तुमने कभी देखा।
तो क्यों बनाई  याद करने की रेखा।
अब  दूर -दूर रहना है इस जहाँ में,
तो क्यों करें हम यहाँ देखीं-देखा।
०३-०१-२०१६

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मैं तुममें जो समझा वो न देख पाया।
समझने की कोशिश की न हो पाया।
अब राह बदल लो तूँ मेरी जिन्दगी से,
चाल बदल लो तूँ मैं खुश न रह पाया।
०३-०१-२०१६

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सीमारेखा पर डटे भारतीय वीर जवान।
पीछे नहीं वो हटे भले हुए लहू-लुहान।
आतंकवादियों से लड़ते रहे तब-तक,
जब-तक खुद हो गये नहीं बलिदान।
०५-०१-२०१६

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अब तुम मेरी हो गई हो, मेरा अरमान पूरा कर दे।
मैं तेरे लिए आया हूँ, तूँ मेरी हर आस पूरा कर दे।
हम दोनों मिलकर दुनिया में ऐसा ख्वाब सजायें,
मैं तेरे सपने सच करदूँ, तूँ मेरे सपने सच करदे।
06-01-2016

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जिन्दगी का हर लम्हा टूट कर बिखर गया।
किसी का साथ देकर मुझसे रूठ कर निकल  गया
कुछ ऐसा करो जतन कि मैं तुम्हारा हो जाऊँ
तुम्हारे साथ रहकर मैं इस जिन्दगी से उबर गया।
०५-०१-२०१६

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यादों के झरोखों में मिलकर तैरते रहेंगे,
यादों रूपी दरिया में डुबे तो खो जायेंगे,।
मिलने की कोशिश करते रहना नहीं तो,
एक दूजे को सदा के लिये  भूल जायेंगे।
अगर सभी कोशिश हमेशा करते रहेंगे।
एकदिन जरूर आपस में मिल जायेंगे।
उसके बाद खुशियाँ एक दूजे में बाटेंगे,
फिर हमेशा की तरह बात करने लगेंगे

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जीवन की ज्योति जलाते रहें,
प्रकाश की किरण फैलाते रहें।
जो हैं अभी भी अंधेरों में डूबे ,
उनके यहाँ प्रकाश पहुंचाते रहें।।

••••••••••••••

आदरणीय मित्रों के प्रति समर्पित —

मेरे आदरणीय मित्रो पोस्ट पर भी आया करें कभी कभी।
मेरी रचनाओं को पढकर कमियां बताया करें कभी कभी।
मैं उम्मीद ही नहीं बल्कि इस काम केलिए आशा रखता हूँ।
सुझाव सलाह रूपी सहयोग हमें दिया करें कभी -कभी।
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आप अपने लेखनी को मत छोड़ियेगा।
हौसले के उड़ान को नहीं तोड़ियेगा।
यह मिला हुआ गुण ईश्वरीय वरदान है ,
इस दुनिया में लावारिस मत छोड़ियेगा।

पढने की बात रही सो पढा कीजिएगा,
पढने के जरिये ही लेखन कीजिएगा।
ज्ञानोदय में इसका भी अहम स्थान है,
जिन्दगी के हिस्से में जगह दीजिएगा
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आपस में आप सभी मित्र जन होली मनाई,
प्रेम रूपी दिलभरे रंगों को एक में मिलाई,
यही  मैं ईश्वर से कर बद्ध प्रार्थना करता हूँ,
सभी मित्र अपने-अपने घर खुशियाँ मनाई

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पैग-पे- पैग हम तो चढाते रहे।
जाम-पे-जाम हम तो लगाते रहे।
जैसे जन्नत में हूँ ऐसा हुआ असर,
आनंद, कुछ समय गुदगुदाते रहे।

पानी को हर पैग में, मिलाते रहे।
दोनों मिलकर नशा भिगाते  रहे।
बाद में मेरा, मौसम रंगीन हुआ।
कि अपने को ख्वाब में डुबाते रहे।
••••••••••••••

रह-रह कर मन में क्यों कसक उठ जाती है
मेरे दिल पर दर्द की क्यों दस्तक दे जाती है
जितनी भी कोशिश करता हूँ उसे भूलने की
उतनी ही अधिक उदासी मन में छा जाती है

•••••••••••••
घुमड़-घुमड़ कर बादल आया,
चारों तरफ पानी बरसाया।
पानी की बौछारें करके,
किसान भाइयों को तड़पाया।
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अपने आपके लिए…. बहुत से लोग जीते हैं।
कभी एक दूजे के लिए भी.. लोग जी लेते हैं।
ऐसा करें, लोग दिल में अच्छा जगह देते रहे,
अपने से ज्यादा दिलदार दूसरे लोग ही देते हैं।
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सुनो साथियों हमसे दिल लगाकर तो जाना,
एक पल हँसीं ख्वाब में बिताकर तो जाना।
मेरी इन अदाओं को~~ एक बार तो देखो,
आगोश बाहों का क्षण भर लेकर तो जाना।
०७-०७-२०१५

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अब तुम्हारे साथ रहने को दिल करता है,
साथ में रहकर हँसने को दिल करता है,
जब दूर रहना था हम दोनों को यहां पर,
तो हम एक दूसरे के साथ क्यों रहता है
२४-०२-२०१५

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काले-काले बालों को लहराने से, नभ में काली घटा छाने लगी।
ओठों पर मुस्कुराहट लाने से~~चेहरे पर हरियाली छाने लगी।
ये जुल्फे, ये आँखें, इस मधुर-मधुर मुस्कुराहट के संमागम से,
ऐसा कर गई, मुझ पर जादू, कि ख्वाबों-ख्यालों में आने लगी।

••••••••••••••
हर लोग आज यहाँ पर परेशान क्यों हैं
एक दूसरे को आजमाने में हैरान क्यों है
आपस में टकराकर समाप्त हो रहे है
दुनिया में बन गया ऐसा इन्सान क्यों हैं
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ये दोस्ती का कितना खुशनुमा पल है
रिमझिम से, मिलकर कितना तर हैं
हमेशा बने रहे आपका सुनहरा पल
हमारी हर क्षण दुआ आपके उपर है
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कहीं है गर्मी कहीं है धूप कही आग की लपट चल रही है।
कहीं पशु, छाँव एवं कहीं मछलियाँ पानी बिन तरस रहीं हैं।
सूर्य कि किरणों ने इतना आग  की  ज्वाला  उगल रही है।
कि मानव जाती ने भी  शीतलता की तलाश कर रहीं हैं।।
११-०६-२०१५

••••••••••••••
पर्यावरण का सुरक्षा  करना हमारा धर्म है
वृक्ष और पौधा लगाना यही हमारा कर्म है
इससे वायुमंडल का संतुलन हो जाता है
पृथ्वी को हरा भरा करना यही सत्कर्म है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दुनिया वालों से हमारा एक यही पुकार है
बच्चों की भान्ति वृक्षों का सत्कार करना है
वृक्षों से धरा को सजाने और सँवारने के लिए,
वृक्षारोपण  के लिए सभी को प्रेरणा देना है

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नज़र से नजर मिली तो मुलाकातें बढ गई।
हमारे तुम्हारे सफर की कुछ बातें बढ़ गई।
हर मोड़ पर खोजने लगी तुम्हें मेरी आँखें,
ऐसा हुआ मिलन कि हर ख्यालों में आ गई।
/०७-०६-२०१५

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जिन्दगी बहुत हसीन है हँस- हँस के जीना यारों ।
दुनिया बहुत लम्बी-चौड़ी है सबको हँसाना यारों।
अपने तरफ से सबका पूर्ण सहयोग करना यारों।
किसी को दर्द की दुनिया मे पहुचाना नही यारों ।
नज़र से नजर मिली तो मुलाकातें बढ गई।
हमारे तुम्हारे सफर की कुछ बातें बढ़ गई।
हर मोड़ पर खोजने लगी तुम्हें मेरी आँखें,
ऐसा हुआ मिलन कि, हर ख्यालों में आ गई।
०७-०६-२०१५

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अरूणोदय के समय में,सुनहरे तीर  बरसाते हुअे।
किरण में अन्तर्निहित हुए,विखरने लगा धरातल पे।
जाग गई सभी वनस्पतियां ,जाग गई सब मानवता,
चहचहाने लगी चिड़ियाँ ,लिए भाव कोमल विखेरते।
२४-०२-२०१५

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आपकी यात्रा मगलमय हो।
हमेशा आप कल्याणमय हो
बढते रहे मंजिल की तरफ,
जीवन आपका सुखमय हो।।

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मुझे तुम्हारी याद क्यों~ सताया करती है।
बिच-बिच में क्यों~~~ तड़पाया करती है।।
आना है तो आ जाओ मेरे दिल के अन्दर,
बातें करके हमेशा क्यों फसाया करती हैं।।

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इस धरती पर बोझ बढा है,
माँ धरती का कष्ट बढा है,
आओ मिलकर करें पूजा,
कभी न इससे कद घटा है।

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आपके लेखनी में है दम,
चार चाँद लगाते हरदम,
शब्दों को चुन-चुन करके,
दिखा देते हैं अपना दम।

••••••••••••••••

आपकी नज़रो ने समझा प्यार के काबिल मुझे,
मिल गयी मंज़िल——- आपकी नजरों से मुझे,
इसलिए आपको —आभार व्यक्त करता हूँ मैं,
आपकी धड़कन की आवाज़— कबूल है मुझे।

••••••••••••••••••
काले-काले बालों को लहराने से, नभ में काली घटा छाने लगी।
ओठों पर मुस्कुराहट लाने से~~चेहरे पर हरियाली छाने लगी।
ये जुल्फे, ये आँखें, इस मधुर-मधुर मुस्कुराहट के संमागम से,
ऐसा कर गई, मुझ पर जादू, कि ख्वाबों-ख्यालों में आने लगी।

••••••••••••••••••

अंधेरी रातों में, लौह की ज्योति जलाये हुए हैं
आपके अगमन में,  पलकों को उठाये हुए हैं
मेरे इन्तजार की घड़िया, कब समाप्त होगी
आने की चाह में पलक पावड़े बिछाये हुए हैं।।
१९-०८-२०१५

••••••••••••••••••

बादलों का, जब आपस में, होता है समागम।
घटा-घनघोर बीच आपस में होते हैं हृदयंगम।
टपकाते हैं खुशी के अश्रुपात हमारे आँगन मे,
सर्वत्र खुशियाँ बिखेरने में भूल जाते सारागम।।
२०-०८-२०१५

••••••••••••••••••••

प्यार  करने वाले बड़े ही बदनसीब होते हैं।
ऐसे ही बीच राहों  में भटकते छुट  जाते हैं।
खुदा के सिवाय उनका कोई सहारा नहीं है,
इस दुनिया में आकर वो पागल कहलाते हैं।
•••••••••••••••••••••••••••••

आपकी याद में~~ खोए हुए हैं।
अपने बेड पर~~~ सोये हुए हैं।
आपसे बातें~~~~~ करते हुए,
अपने सपनों को~संजोये हुए हैं।
३०-०७-२०१५

•••••••••••••••••••

जागो हमारे शिक्षक भाइयों।
आँखें खोलो हमारे भाइयों।
भविष्य अब खराब हो रहा है,
कोर्ट का द्वार देखिए भाइयों।
(शिक्षक हित में जारी)

•••••••••••••••••••••

हर किसी को साथ में लेकर चलना काम मेरा यही है।
पीछे मुड़कर देखना नहीं ——जज्बात मेरा यही है।
सबको साथ लेकर चलना—- हर समय प्रयासरत हूँ,
हर परिस्थितियों में सहयोग करना, काम मेरा यही है।

•••••••••••••••••••••

भोग लिप्सा आज भी~~~ हर जगह चल रही है।
नर की भावना असहाय~~हर जगह बह रही है।
अब तक सुशीतल हो सका न~~~~पुरा संसार,
अमृत की बारिश धरा पर हर जगह  पड़ रही है।
०७-०८-२०१५

••••••••••••••••••••

खत्म नहीं हुआ अभी मोहब्बत का फंसाना।
अभी संयोग पुरा हुआ, वियोग का हैं आना।
०९-०८-२०१५

•••••••••••••••••••••

प्रेम में रंजीत कर जीवन प्रेमयुक्त कर दो।
प्रेम भरी दुनिया में मुझे~~ प्रेमी बना दो।
स्नेह के बगीचे में~~~~~~ फूल लगाकर
सभी के अन्दर~ प्रेम रूपी फूल खिला दो।
२५-०८-२०१५

••••••••••••••••••••••
शिक्षकों का जहाँ हुआ- अपमान।
पनपने लगे चोर, डाकू, बेईमान ।
यहाँ बिहार का विकास कैसे होगा,
जब शिक्षक खोने लगे– सम्मान।।

••••••••••••••••••

हद से ज्यादा खुश हैं—- क्या बात है।
चेहरे पर भरपूर मुस्कान, लाजवाब है।
किस कारण– खिलखिला उठा चेहरा,
मुझे भी जानने की, हृदय से आस है।।
१४-१०-२०१५

••••••••••••••••••

आँख में भरी है~~~~ मस्ती ।
ओठ पर हँसीं है~~छलकती ।
कहाँ से खुशबू की खुशबूदार,
खुशबू है~~~~~~ महकती।।

••••••••••••••••

ये काले-काले——- बालों के बीच में,
कोई कली———— खिल चुकी है।
हँसते— मुस्कुराते— चेहरे के बीच में,
ये अधर गुलाब की पंखुड़ि बन चुकी है।
१४-१०-२०१५

•••••••••••••••••

इसी तरह हमेशा चेहरे पर रहे~~~ मुस्कान।
जीवन के सफर में छुते रहे~~~~ आसमान ।
कभी भी आपके जीवन में आयें न रुसवाईयां,
दामपत्य जीवन में पुरा होते रहे~~~ अरमान।
०८-१०-२०१५

••••••••••••••••••

जिन्दगी के राह में,अनेकों मोड़ मिलते हैं।
सब पर लोग चलकर~ गुजरना चाहतें हैं।
हर समय बिताने के बाद~~ आखिरी में,
एक ही जगह पर जाकर लोग मिलते हैं।।
०६-१०-२०१५

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कहाँ  छोड़कर~वो चली।
खिली मिली थी वो कली।
हँसीं देकर मेरे हृदय में,
किस पथ पर~ वो चली।।
०५-१०-२०१५

•••••••••••••••••

भाई बहन का  प्यार~ आज है राखी का त्यौहार।
आज भाई अपने बहन को खूब सारा देता प्यार।
बहन ने  भाई की कलाई में~ धागा को बाधकर,
एक दूसरे के रक्षा के लिये करते हैं~ व्यवहार।।
२९-०८-२०१५

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नहीं   मतलब   है   हमें  किसी  सरकार से।
अगर मतलब है तो सिर्फ़ अपने अधिकार से।
कोशिश  करते  रहेंगे  हमेशा मरते दम तक,
लड़ना  ही  मेरा  जन्म  सिद्ध   अधिकार  है।
०५-११-२०१५

••••••••••••••

सौन्दर्य को देखकर किसी के हृदय पर भाव उमड़ी होगी।
हृदय के रास्ते मानसिक पटल से कोई शब्द गुजरी होगी।
किसी रचनाकार के निरन्तर प्रयास करने के— पश्चात् ही,
शब्दों के जरिए वाक्य बनाने के लिए चाहत निकली होगी।
०१-१२-२०१५

••••••••••••••••••••

तुम्हारी आहट को सुनकर—- गुनगुनाया।
तुम्हारी आवाज़ को परखकर- मुस्कुराया।
हर अदाओं को रखने की कोशिश किया मैं,
लेकिन हो बहुत दूर यह सुनकर मुरझाया।
०१-१२-२०१५

••••••••••••••••••

मैं दुखी हूँ इस—– जहां से।
करता है मन चल दूँ यहाँ से।
इस दुनिया में नहीं है- रहना,
फंस गया आ के मैं कहाँ से।

••••••••••••••

धुप न रही—– छांव न रहा।
गम न रही—– याद न रहा।
वो चलती रही, मै चलता रहा।
वो आती रही—मैं जाता रहा।
२४-१०-२०१५

••••••••••••••••

कहाँ  छोड़कर~~~वो चली।
खिली मिली थी~~ वो कली।
हँसीं देकर मेरे~~~हृदय में,
किस पथ पर~~~ वो चली।।
०५-१०-२०१५

•••••••••••••••••
तेरा यहा पर ठौर ठिकाना— तू कुछ भी कर सकता है।
भले  ही  इसके  लिए-  तू -भ्रष्ट- पथ पर चल सकता है।
नीचता पर उतर सकता है स्वार्थ-सिद्ध-पूर्ण करने के लिए,
मिट्टी-पलीद हो जाये भली लेकिन पीछे नही हट सकता है।
२२-११-२०१५

•••••••••••••••••••

जब बन-सवँर-कर निकलती थी वो।
मेरे दिल -जिगर पर गुजरती थी वो।
मेरे अंदर ऐसा भाव जागृत कर गई,
हरदम हृदय-तल पर उमड़ती थी वो।
२३-११-२०१५

•••••••••••••••

सौन्दर्य को देखकर किसी के हृदय पर भाव उमड़ी होगी।
हृदय के रास्ते मानसिक पटल से कोई शब्द- गुजरी होगी।
किसी रचनाकार के निरन्तर प्रयास करने के—- पश्चात् ही,
शब्दों के जरिए वाक्य बनाने के लिए चाहत निकली होगी।
०१-१२-२०१५

•••••••••••••••

तुम्हारी आहट को सुनकर गुनगुनाया।
तुम्हारी आवाज़ को परखकर मुस्कुराया।
हर अदाओं को रखने की कोशिश किया मैं,
लेकिन हो बहुत दूर यह सुनकर मुरझाया।
०१-१२-२०१५

••••••••••••••••

तुम कहाँ गई थी माँ~~मैं कबसे भूखी।
दाना चुग कर लाई है~मैं कबसे दुखी ।
मुझे भी चलना फिरना अब सिखला दो,
गगन में पंख फैलाना है, यह मेरी रुचि।
१३-११-२०१५

••••••••••••••••••

रात के अंधेरे में तेरी– परछाइयाँ दिखती हैं।
यादों के दायरे में  तेरी अच्छाइयाँ दिखती हैं।
मेरे ख्वाबों को हकीकत में- कर दो तब्दील,
यादों में हर वक्त तेरी अंगड़ाइयाँ दिखती हैं।
१७-११-२०१५

•••••••••••••••••••

एक झलक दिखला दो कहाँ खो गई हो।
रोज ख्यालों में आती हो कहाँ सो गई हो।
तुम्हारे इन्तजार में पलक पावड़े बिछाए है,
महसूस होता है जैसे कोई बात हो गई हो।
१८-११-२०१५

•••••••••••••••••••

इस दुनिया में बहुत दूर हो तुम।
मेरे लिए बहुत नजदीक हो तुम।
यादों में हर वक्त होती मुलाकातें,
हकीकत में बहुत करीब हो तुम।
१८-११-२०१५

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ज्ञान की इस दुनिया में किताबों का महल हो।
हर वक्त वहाँ पर अच्छे ज्ञानियों का टहल हो।
शिक्षा प्राप्त करने का एक बन जाय गुरुकुल,
भविष्य सुंदर बनाने वाले बच्चों का पहल हो।।
१८-११-२०१५

•••••••••••••••••••

मतलब नहीं हमको किसी  सरकार से।
हमको मतलब है बस अपने अधिकार से।
कोशिश करेंगे हम मरते दम तक सदा,
जन्म सिद्ध अधिकार को छीनेंगे सरकार से

•••••••••••••••••••

तुम्हारी आहट को सुनकर— गुनगुनाया।
तुम्हारी आवाज़ को परखकर मुस्कुराया।
हर अदाओं को रखने की कोशिश किया मैं,
लेकिन हो बहुत दूर यह सुनकर मुरझाया।
०१-१२-२०१५

•••••••••••••••••

यादों में इस तरह मुझे सुलगता छोड़ गया।
तनहाईयां देकर- मुझे उबलता छोड़ गया।
क्या करें ख्यालों में– परछाइयाँ दिखती है,
दिल-जिगर पर प्यार, उफनता छोड़ गया।।
१२-१२-२०१५

•••••••••••••••••

सर्दीयों के सुबह में—-कुंहरा छाने लगता है।
धुन्ध बनकर, धरातल पर—- आने लगता है।
घास के शिर्ष पर चमकता, मोतियों की तरह,
सूर्य की रोशनी आते ही पुन: जाने लगता है।।
१५-१२-२०१५

••••••••••••••••

गगन में चाँद- तारें हैं।
रोशनी में चमन सारे हैं।
खुशियों का अम्बार है,
यहां सभी प्राणि न्यारे हैं ।।
१५-१२-२०१५

•••••••••••••••••••

यही होता है आज के प्यार में।
यही होता है प्यार के खुमार में।
सोच-सोच कर लोग दर्द पीते हैं,
प्यार के अन्त-अन्जाम को संसार में।।
१५-१२-२०१५

•••••••••••••••

नदी  की धार बलखाती हुई।
बीच में नाव डगमगाती हुई।
किनारों से करेगी मुलाकात,
लहरों के साथ लहराती हुई।।
१६-१२- 2०१५

” फुटपाथ के बशिंदे “

पिघल उठता है हृदय,
जब नजर जाती है फुटपाथ पर,
कैसे ? बिताते हैं अपना जीवन।
उस भयानक डगर पर।
अपना बसेरा खुले आसमान में बनाये हैं।
रुलाई गुप्त कमरे में,
उनके हृदय में उमड़ती है।
सुसंस्कृत,बुद्धिमानों की श्रेणी में नहीं आते।
इन सब चीजों से दूर,
उसी परिवेश में जन्मे बालकों का,
परिवरिश करती हैं।
असंख्य स्त्री पुरुष भटकते,
किसी वस्तु की खोज में।
रूकना चाहते हैं कहीं,
लेकिन मिलो दूरियां पैदल चले जाते हैं।
अंधेरी खांई रूपी जीवन को पार करते हुए।
जीवन कठिनाई से काटतें हैं।
गन्दी बस्तियों में नालों के पास,
अपना आहार बनातें हैं।
पत्थर और ईट के चूल्हों पर,
सुलगाते हैं आग।
पकाते हैं भोजन।
वहीं फुदकते हैं दो चार,
ठोस बनी स्त्री-पुरुष की आकृतियाँ।
चिलचिलाती हुई धूप में।
मुझे होती है ग्लानि,
इस देश की असली तस्वीरें देखकर।
आज भी लोग,
इस कदर जीवन जीने पर मजबूर हैं।
पिघल उठता है हृदय,
जब नजर जाती है फुटपाथ पर।
रमेश कुमार सिंह /०७-०८-२०१५

“मोहब्बत को मन में सजाये हुए हैं ••!”(कविता)

मैं भी अन्जान था वो भी अन्जान थी
जिन्दगी के सफर में एक पहचान थी
दोनों के नयन जब आपस में मिले
दिल में हलचल हुई मन सजल हो उठे
तब बातों का सिलसिला शुरू हो गए
वो कुछ कहने लगी मैं कुछ कहने लगा
बातों के दरमियान प्यार पनपने लगा
क्षण-प्रतिक्षण एक दूसरे में घुलने लगे
खुशियाँ मिली जैसे फुल खिलने लगे
एक सुहानी डगर का निर्माण हुआ
जिस पर हम दोनो सफर करने लगे
मौज-मस्ती की दुनिया में हम बढ चले
इस दुनिया से कुछ लोग अन्जान थे
उनको ऐसा लगा हम गलत हो गये
इस मोहब्बत पर उनकी नजर लग गई
हुआ वही जो, वे लोग चाहने लगे
जिवन मे एक ऐसा तूफान आ गया
न चाहते हुए भी दिल विछड़ने लगा
वो दूर होती गई मैं दूर होता गया
पल-भर मिलने को दिल तरसता रहा
जब मोबाइल का सिग्नल जुड़ गया
नम्बर का आदान- प्रदान हो गया
कुछ दिनों तक आवाज़ कान में आती रही
एक दिन बातों ही बातों में तकझक हुई
कुछ दिनों तक आवाज़ बन्द हो गई
मै मैसेज के जरिए धन्यवाद देता रहा
अन्ततः मैसेज का उसे कुछ असर हुआ
फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया
दोनों एक दूसरे को देखने के लिए
वो भी तड़पती वहाँ मैं तड़पता यहाँ
वो भी मजबूर वहाँ मैं मजबूर यहाँ
दोनो मिलने की तरकीब बनाते रहे
लेकिन मिलने की कोशिश नाकाम रही
फिर भी भविष्य में आस लगाये हुए हैं
इस उम्मीद से प्यार को बनाए हुए है
मोहब्बत को मन में सजाये हुए हैं
—@रमेश कुमार सिंह

मेरे जिन्दगी का एक लम्हा …..(संस्मरण)

अपने गाँव से लेकर बनारस तक खुशी पूर्वक शिक्षा लेकर आनन्द पूर्वक जिवन व्यतीत कर रहे थे तभी एक तुफान आया जो हमारी जीवन के बरबादी का शुरूआत लेकर। एक फूल की तरह हमारी जिन्दगी सवंर ही रही थी कि बारिश के साथ आया तूफान फूल के पंखुड़ियों को झड़ा दिया बस बाकी रह गया वो पत्तियां और टहनिया जिसके जरिए जीना है ।इसी बिच आशा की किरण जगी, जिसके सहारे मैं आगे बढ सकता था वो शिक्षण का आधार था। नहीं पता था इस आशा की किरण में कहीं निराशा भरी दुनिया कि भी शुरूवात होती है यही आधार ने एक तरफ जीने की कला सीखाई वही दूसरी तरफ संघर्ष करने की या समस्याओं से निपटने की राह दिखाई।
उसी आशा की किरण के सहारे मैं आगे बढ सकता था । तभी इस पतझड़ रूपी दुनिया में कोई बारिश की बुन्दे टपकाकर ताजा करने की कोशिश की और उसी के सहारे यह पतझड़ धिरे-धिरे हरा-भरा होकर लहलहाने लगा और खुशी के मारे झुम उठा इतना झुम उठा कि वह भूल गया कि पतझड़ की प्रक्रिया अपने समय पर निरन्तर चलते रहती है और इसी के साथ वो धिरे-धिरे आँखों के रास्ते दिल में उतर गई।बस सिलसिला शुरू हुआ एक सुहाना पल का पता नहीं था इस सुहाने पल में छिपी हुई गम की बदलीं है जो छायेगी तो छाये ही रह जायेगी ।
@रमेश कुमार सिंह ♌,०८-०२-२०१३
http://shabdanagari.in/website/article/मेरेजिन्दगीकाएकलम्हासंस्मरण

“दो महीना आठ दिन” ….(संस्मरण)

मनुष्य एक समाजिक प्राणी है जो समाज में रहकर हमेशा आगे बढने का प्रयास करता है। शायद यही प्रयास उसके जीवन में रंग लाता है। इनका जीवन, असीम इच्छाओं एवं आवश्यकताओं से भरा पड़ा है। इनकी आकांक्षाएँ ही इन्हें आगे बढने को प्रेरित करती है। शायद इसी का थोड़ा बहुत प्रभाव मेरे उपर है और मैं भी आगे बढ़ने के लिये हमेशा प्रयास करता हूँ।
मुझे ऐसा लगा कि हाईस्कूल में मौका मिल सकता है। तो क्यों न उसके लिए प्रयास करूँ। इन्तजार था तब तक बिहार सरकार के शिक्षा विभाग से शिक्षकों की बहाली का विज्ञापन निकाल ही दिया। विज्ञापन जब मैं देखा तो मुझे लगा कि बड़े बच्चों को पढाने के लिए अच्छा मौका है। और मैं आठ जिला में आवेदन जमा कर दिये। बाद में पता चला कि सभी जिलों का काउंसिलिंग का दिन एक ही तारीख को पड़ गयी है। मैं पड़ा असमंजस में कि अब क्या करें ? किसी एक जिला का चुनाव करना था जहां से आसानी से नियुक्त पत्र मिल जाए। सभी जिला को छोड़कर दो जिला का चुनाव किया जिसमें पहला औरंगाबाद तथा दूसरा जिला भोजपुर। इसके बाद दोनों में शामिल कैसे हुआ जाय ? यह प्रश्न सामने खड़ा हो गया। दोनों जिला के बिच की दूरी लगभग सौ किलोमीटर रही होगी । अगर शिक्षक बनना है तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। तभी अचानक मेरे अन्दर एक तरकीब आई कि क्यों न बाइक का सहारा लिया जाए और यही हुआ। मैं बाइक चलाने का उतना जानकार नहीं था कि इतना लम्बा सफर कर सकूँ।
तब तक काउन्सिलिंग की तारीख आ गई। सभी प्रमाणपत्र के साथ तैयारी हो चुकी थी। और एक अच्छे बाइक चालक का भी चुनाव कर लिए थे। अब सुबह में निकलने की तैयारी हो गई थी। सूर्य की किरणें उगने से पहले ही ठन्ढे-ठन्ढे बयारों को चिरते हुए नेशनल हाईवे-दो पथ पर औरंगाबाद की दिशा में अपनी मोटर साइकिल आगे बढने लगी। ९:०० बजे तक काउन्सिल स्थल पर पहुँच गये। वहाँ पर काफी भिड़ मची हुई थी उसी भिड़ के एक पंक्ति में मैं जाकर खड़ा हो गया। अपनी बारी की प्रतीक्षा में इन्तजार करने लगा। अंन्तत: ११:०० बजे तक वहाँ के कार्य का पुरा निपटारा हो गया। इसके बाद हमारे चाचा ही चालक के रूप में सहयोग दे रहे थे उनसे सलाह मशविरा करने के बाद आरा(भोजपुर) काउंसिल स्थल का चयन किया गया और चलने की तैयारी हो गई।
सूर्य की रोशनी का ताप बढते क्रम में था। साथ -साथ हवाये भी गर्म चलने लगी थी। पथ पर धुल भरे कणों का जमाव था जो हवाओं के साथ मिलकर सैर कर रहे थे उन्हीं के बिच से हमारी मोटर साइकिल औरंगाबाद – डेहरी पथ पर आरा के लिए गुजरने लगी । डेहरी से विक्रम गंज होते हुए आरा पहुँचे। काउंसिल स्थल का पता लगाकर ४:४५ सायंकाल अन्दर प्रवेश कर गये। और काउन्सिलिग करा लिए। लौटने की बात सोचने लगे।
सूर्य अपनी रोशनी को अच्छे तरीके से समेट चुके थे गदहवेला का समय था धिरे-धिरे अन्धकार छानेलगा पथ पर सूर्य की रोशनी के जगह मानव निर्मित रोशनी आने लगी उसी रोशनी में हमारी मोटर साइकिल आरा-मोहनिया नेशनल हाईवे -३० पथ पर आगे की तरफ बढने लगी । दिन भर चलने के वजह से इतना थकान हो गया था कि आगे बढने की हिम्मत नहीं कर रही थी फिर क्या बिच में आकर एक रिश्तेदार के यहाँ ठहर जाते हैं।वहा रात्रि विश्राम करने के बाद पुनः सुबह में अपने घर की तरफ चल दिये।
सभी प्रकिया से गुजर चुके थे अब इन्तजार था नियुक्ति पत्र का कि कब मिलेगा। उस समय मैं सासाराम में था। मेरे यहाँ मेरे घर से दूरभाष से ज्ञात हुआ कि १५ मई २०१३ को आरा से नियुक्ति पत्र आया है। मुझे सुनकर खुशी हुई। लेकिन दुख तो तब हुआ जब योगदान के समय स्वास्थ्य प्रमाणपत्र की आवश्यकता पड़ती है और मैं उसे बनवाने के लिए कैमूर बिहार के १६-०५-२०१३ को सदर अस्पताल भभुआ गया और वहाँ आवेदन भर कर जमा कर दिया थोड़ी देर बाद पता लगाया तो वहाँ का लिपिक सीधे पैसे की बात कही पैसा दीजिएगा तो दो घण्टा के अन्दर आपको। प्रमाणपत्र मिल जायेगा। मैं दंग रह गया कि बिना पैसे दिये कोई कार्य नहीं हो सकता है । बहुत सोचने वाली बात थी कि इतने भ्रष्ट कर्मचारी होगे जो सरकार के द्वारा जनता की सेवा। के लिए बैठे हुए हैं वहीं लोग जनता से इस तरीके से व्यवहार करते हैं। क्या करें मजबूरी थी देकर के प्रमाणपत्र बनवाना पड़ा ।
प्रमाणपत्र पत्र बन जाने के बाद मैं बस के द्वारा उच्च माध्यमिक विद्यालय धनगाई भोजपुर पहुँच गया। तो विद्यालय पर प्रधानाध्यापक नहीं थे। पता लगाकर उनके आवास पर मैं पहुँचा। उनसे परिचय हुआ और नियुक्ति पत्र का छायाप्रति देकर वापस घर चला आया।
दूसरी बार विद्यालय पर पहुँच गया,पहुँचते ही विद्यालय के बारे में जानकारी प्राप्त कर लिया तो मैं अवाक रह गया कि ऐसा विद्यालय भी होता है। सोचने वाली बात है कि दो रूम एक वरामदा और एक कार्यालय इसी में वर्ग दस तक का पढाई का संचालन हो रहा था। कार्यालय का यह हालत था कि उसमें दो कुर्सी एक टेबल के बाद तीसरी कुर्सी को उसमें जाने के लिए उसमें से एक कुर्सी को निकलने का इन्तजार करना पड़ता था। चावल भी उसी में अपना स्थान बनाया हुआ था जो मिड में मिड के लिये रखा गया था। खैर इन सब चीजों से मुझे मतलब नहीं रखना था ।
मुझे तो मतलब अपने कार्य से रखना था लेकिन वहाँ के लोगों का दुर्भाग्य कहे कि अपना दुर्भाग्य कहें ये मैं समझ नहीं पा रहा था। वहा पर हाईस्कूल का कार्य ही संचालन नहीं हो रहा था । मुझे याद है सब कार्य जो कागजी था आरा से विद्यालय तक स्वयं करना पड़ता था बहुत समस्या थी जिसको झेलना पड़ता था वैसी स्थिति बिते समय में नहीं आईं थीं। लेकिन नौकरी करना है तो बहुत सी बातों को नजर अंदाज कर चलना पड़ता है अन्ततः चौबीस मई दो हजार तेरह को विद्यालय में योगदान कर लिया तब तक पाँच जुन से छब्बीस जून तक ग्रीष्मकालीन अवकाश हो जाता है।
फिर विद्यालय सताईस जून को पुनः खुलता है वहाँ गया उपस्थिति बनाकर वापस घर चला आया मन नहीं लग रहा था कैसे लगेगा ? जीस पद के लिए गये थे उस पद का कोई कार्य ही नहीं था। बच्चे ही नहीं थे। उसी में प्रारंभिक विद्यालय के बच्चों को पढाया करता था। इसमें किसका कसूर था मेरे भाग्य का मा फिर सरकार का समझ नहीं पा रहा था इसी उलझन में रहकर किसी तरह एक- एक दिन बिता रहा था। दूसरे जिलों में भी प्रयासरत रहा ।तभी ईश्वर ने मेरे उपर एक नजर डाली और शायद मेरे कष्टों को परखकर इस जेल से छुड़ाने की कोशिश किया हो और छुड़ा भी लिया। जुलाई माह के अन्त में ही रोहतास एवं औरंगाबाद दोनों जिला से नियुक्ति पत्र मेरे घर पहुँच गया।इसकी जानकारी मुझे घर वाले के माध्यम से मिली मैं सताईस जुलाई को फौरन वहाँ से घर की तरफ चल दिया।और मैं रोहतास जिला को पसंद किया और रामगढ चेनारी में जाकर उस विद्यालय के बारे पता लगाया। लोगों ने प्रारम्भ में बहुत ही व्यवहारिकता दिखाया और मुझे वहाँ आने के लिए प्रेरित किया। मैं सोचने का वक्त लेकर वापस घर चला आया। दूसरे दिन मैं उत्क्रमितम माध्यमिक विद्यालय धनगाई भोजपुर पहुँचा तो सोच विचार के उपरांत मैं तीन अगस्त दो हजार तेरह को अपने पद से परित्याग पत्र दे दिया। थोड़ी समस्या आईं लेकिन उससे निपटते हुए वहाँ से विदा हो लिया।और वापस घर की तरफ चल दिये। और पाँच अगस्त दो हजार तेरह को पुनः उच्च माध्यमिक विद्यालय रामगढ चेनारी रोहतास में योगदान कर अपने कार्य में लग गये।
यही हमारा दो महीना आठ दिन का सफर रहा।जो एक तरफ कष्टकारक एवं परेशानियों से भरा हुआ वहीं दूसरी तरफ इतने कम दिनों में ज्यादा कुछ सीखने को मिला समस्याओं से निपटते हुए आगे कैसे बढना है यही जानकारी हासिल हुई।
@रमेश कुमार सिंह /०६-०४-२०१५

“हौसला” (कविता)

अपने हौसला को बुलन्द रखना है
सम्भल-सम्भलकर यहाँ चलना है
जिन्दगी के सफर में काटे बहुत है
अपने पथ से बिचलित नहीं होना है

जो भी आते हैं समझाकर रखना है
अपने शक्ति में मिलाकर रखना है
सीखना-सीखाना है उन्हे सत्य का पाठ
इस कार्य को कर्तव्य समझकर चलना है

हम जो भी है अभी इसे नहीं गवाना है
इसी के बल पर आगे रास्ता बनाना है
हक के लिए हमेशा लड़ना है यारों
सरकार हो या नेता कभी पिछे नहीं हटना है

पहले हम लोगों को कायदा बनाकर चलना है
भाई चारे का भाव बरकरार रख कर चलना है
अगर फिर भी नहीं छोड़ते हैं हम पर राज करना
कफन सर पर बाधकर,सामना डटकर करना है।
———रमेश कुमार सिंह

मंजिल (कविता)

मंजिल की तरफ बढते रहना।
हरदम कदम को बढ़ाते रहना
जिन्दगी, है लक्ष्य को पाने लिए
उन्नति के पथिक बने रहना।

जिन्दगी में बहुत सी समस्याएँ।
धैर्य के बल पर इसे निपटाएँ ।
तभी होगे हम लोग मजबूत,
सबको यही हम पाठ सीखाएँ।

रास्ता है बहुत टेड़ा-मेड़ा।
पार करना जिवन का बेड़ा।
रोड़े आते रहते हैं बहुत से,
सबसे तो निपटना ही पड़ेगा।

हिम्मत रखकर आगे बढना।
लक्ष्य से कभी नहीं भटकना।
हमेशा यही कोशिश करना।
मंजिल तक जरूर पहुँचना।
———रमेश कुमार सिंह

“मानव ” (कविता)

मानव अब मानव नहीं रहा।
मानव अब दानव बन रहा।
हमेशा अपनी तृप्ति के लिए,
बुरे कर्मों को जगह दे रहा।

राक्षसी वृत्ति इनके अन्दर।
हृदय में स्थान  बनाकर ।
विचरण चारों दिशाओं में,
दुष्ट प्रवृत्ति को अपनाकर।

कहीं  कर रहे हैं लुट-पाट।
कहीं जीवों का काट-झाट।
करतें रहते बुराई का पाठ,
यही बुनते -रहते सांठ-गाँठ।

यही  मानवीय गतिविधियां।
बनाते हैं अपनी आशियाना।
देखते नहीं हैं अपने अन्दर,
बताते हैं दूसरों में खामियां।
——रमेश कुमार सिंह

गरीबी

गरीबी मनुष्य के जीवन में एक मिट्टी की मूर्ति के समान स्थायीत्व और चुपचाप सबकुछ देखकर सहने  के लिए मजबूर करती है शायद उसकी यही मजबूरी उसके जिन्दगी के सफर में एक कोढ़ पैदा कर देती है।ईश्वर भी अजीबोग़रीब मनुष्य को बना दिया है किसी को ऐसा बनाया है कि वो खाते -खाते मर जता है कोई खाये बिना मर जाता है वास्तव में जब कोई गरीबी की मार झेलता है। न जाने उसे कैसी -कैसी यातनाएँ झेलनी पड़ती होगी।उसके उपर क्या गुजरती होगी।वो अच्छा कार्य करने के पश्चात् भी किसी के सामने उसमें कहने की हिम्मत नहीं होती उसके अन्दर बहुत सी बातें आती है लेकिन समाज ने ऐसा उसे एक दर्जा  प्रदान कर दिया है वो उसी के दायरे में रहकर अपने हर काम को करने के लिए मजबूर हो जाता है।इतना ही नहीं इन गरीबों के प्रति सरकार भी अव्यवहार करती है इनके लिए अलग वर्ग बाट कर रख दी है।गरीबों के लिए गरीब भोजन गरीबों के लिये गरीब आवास गरीबों के लिए ट्रेनों में गरीब ट्रेन (समान्य बोगी) बना दी गई।उस ट्रेन में एक तरफ लोगों को बैठने के लिये जगह नहीं मिलता है दूसरी तरफ़ लोग आराम से पैर फैला कर मिठे सपने बुनते सफर करते हैं।एक तरफ लोगों की समस्या के वजह से हालत खराब हो रही है दूसरी तरफ सपनों की नदी में तैरते हुए आनंद के साथ सफर कर रहे हैं।जिन्दगी का सफर दोनों काट रहे हैं एक तरफ कष्टकारक है तो एक तरफ दुखदायक है।क्या ईश्वर की लिला है जिन्होंने मनुष्य को बनाते समय अपने पर भी गर्व किया होगा कि मैं भी एक अच्छे इनसानों को बनाया है। लेकिन वो बनाते समय यह नही सोचे होगें कि ये लोग इतना बड़ा हैवानियत को अपने अन्दर पाल लेगे।
फिर लौटते है उस गरीब की तरफ जो एक दाना के लिए किसी चौराहे पर सुबह से साम तक पेट की छुदा को शान्त करने के लिए एक मनुष्य ही मनुष्य के चेहरे को एक टक देखते रहता है उसकी याचना भरी आखों के सामने कई तरह के चेहरे साम तक नजर आते है। फिर भी उसके पेट की भुख समाप्त नहीं हो पाती है। और उसी रास्ते के बगल में आसमान रूपी छत के नीचे अपनी निंद को पुरा करना चाहता है पर भुख के मारे उसकी निंद पुरा नही होती है और स्वास्थ्य खराब हो जाता है उसके जिन्दगी का सफर पुरा नही हो पाती है ।उस गरीब की रह जाते हैं अधुरे सपने रह जाते हैं अधूरे ख्वाब और रह जाती हैअधूरी जिन्दगी।
गरीबों का कोई अस्तित्व है  मुझे नहीं लगता ऐसा इनका कोई अस्तित्व नहीं है आज के समय में,हाँ इनका एक अस्तित्व है जब किसी को इनकी जरूरत पड़ती है तो चले आत हैं इनका शोषण करने के लिए और अपना स्वार्थ सिद्धि पुरा कर लेते हैं। शायद यही एक गरीब का हाल होता है। आज के समय में एक गरीब होना सबसे बड़ा गुनाह है। हे ईश्वर सबको सबकुछ देना लेकिन गरीबी मत देना।
—————–@रमेश कुमार सिंह