मेरे जिन्दगी का एक लम्हा …..(संस्मरण)

अपने गाँव से लेकर बनारस तक खुशी पूर्वक शिक्षा लेकर आनन्द पूर्वक जिवन व्यतीत कर रहे थे तभी एक तुफान आया जो हमारी जीवन के बरबादी का शुरूआत लेकर। एक फूल की तरह हमारी जिन्दगी सवंर ही रही थी कि बारिश के साथ आया तूफान फूल के पंखुड़ियों को झड़ा दिया बस बाकी रह गया वो पत्तियां और टहनिया जिसके जरिए जीना है ।इसी बिच आशा की किरण जगी, जिसके सहारे मैं आगे बढ सकता था वो शिक्षण का आधार था। नहीं पता था इस आशा की किरण में कहीं निराशा भरी दुनिया कि भी शुरूवात होती है यही आधार ने एक तरफ जीने की कला सीखाई वही दूसरी तरफ संघर्ष करने की या समस्याओं से निपटने की राह दिखाई।
उसी आशा की किरण के सहारे मैं आगे बढ सकता था । तभी इस पतझड़ रूपी दुनिया में कोई बारिश की बुन्दे टपकाकर ताजा करने की कोशिश की और उसी के सहारे यह पतझड़ धिरे-धिरे हरा-भरा होकर लहलहाने लगा और खुशी के मारे झुम उठा इतना झुम उठा कि वह भूल गया कि पतझड़ की प्रक्रिया अपने समय पर निरन्तर चलते रहती है और इसी के साथ वो धिरे-धिरे आँखों के रास्ते दिल में उतर गई।बस सिलसिला शुरू हुआ एक सुहाना पल का पता नहीं था इस सुहाने पल में छिपी हुई गम की बदलीं है जो छायेगी तो छाये ही रह जायेगी ।
@रमेश कुमार सिंह ♌,०८-०२-२०१३
http://shabdanagari.in/website/article/मेरेजिन्दगीकाएकलम्हासंस्मरण

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